UT wordmark
College of Liberal Arts wordmark

Unani History and Treatment

mediaURI: 
vocabulary (hindi): 

Belief, faith

यकीन

Treatment

ईलाज

Hereditary treatment

खानदानी ईलाज

Guru-disciple tradition

गुरु शिष्य परंपरा

Became bounded

दायरे में बंध गये

Disease, illness

बीमारी

Pulse

नब्ज़

Use

इस्तेमाल

 

नब्बाज़

In a country village

गांव-देहातों में

Medicines

दवाईयां

Written

कलमबंद

Resourcefulness

हिकमत

Few medicines

चंद दवाईयां

Jungle, forest

जंगल

Were making themselves

अपने आप बनाते थे

Pill

गोली

 

सदैला

Herb

बूटी

Precedents

मिसालें

Hereditary

खानदानी

On pimples and boils

फोड़े-फुन्सियों पे

Ointment, balm, salve

मरहम

Awareness, vigilance

जागरूकता

Bone treatment

हड्डियों का ईलाज

Hand

हाथ

Distraught, vexed, troubled, worried

परेशान

Life

ज़िंदगी

Livelihood

रोज़ी-रोटी

Became bad

खराब हो गया

Faith, belief

यकीन

Orthopedist, bone specialist

हड्डियों का डॉक्टर

What does not die

मरता क्या नहीं करता

Broken down, finished

बरबाद

Will bear

झेल लूंगा

Well-built people

मुस्टंडे पहलवान

Rolling pin

बेलन

Screamed

चींख मार पड़े

Oh! I'm dead!

हाय मरा

Bones

हड्डियां

Country herbal paste

देसी लेप

Bandage

पट्टी

Herbal paste

लेप

Medicine, drug

दवाई

A glass of milk

एक गिलास दूध

Milk

दूध

Cream

मलाई

Fat

मोटा

Betel leaves

पान

Lime, mortar

चूना

transcription (hindi): 

वैसे ये तो एक यकीन की बात है लोगों के... जहां तक साईंटीफिकल ट्रीटमेंट की बात है, तो साईंटीफिकली अगर किसी को ईलाज दिया जा रहा है, तो जहां तक मेरी अपनी सोच है, वो बैटर ट्रीटमेंट है... मैं ये नहीं कह रहा के जो खानदानी ईलाज चला आ रहा है, या जो गुरु शिष्य परंपरा के ज़रिये ईलाज चला जा रहा है, आ रहा है, वो कम है... बेसिकली यूनानी तो आये ही गुरू शिष्य परंपरा के थ्रू दुनिया में है... और यहां तक देखा गया है कि वो लोग ज्यादा परफैक्ट रहे हैं ईलाज के मामलों में, आज की थ्योरी से... हम लोग तो एक दायरे में बंध गये के, एक लिमिटेशन्स है हमारी, हमने ये पढ़ना है, ये डायग्नोसिस का प्रोसीज़र है, इस सिस्टम पे चलोगे तो ये बीमारी है, इस सिस्टम पे चलोगे ये बीमारी है... आज हम, बेसिकली वैसे भी हम तो नब्ज़ देख के ही ईलाज करते हैं, ये स्टैथो रखा जरूर है और ये ब्लड प्रैशर भी, हम सिर्फ आज की डेट की माडर्न ट्रीटमेंट का सहारा लेने के लिये इसे इस्तेमाल करते हैं, नब्ज़ देख के ही ईलाज देते हैं हम... लेकिन हमसे कई सौ गुणे ज्यादा नब्बाज़ थे वो लोग, जो पहले खानदानी ईलाज लिया करते थे... लेकिन आज की डेट में बैठे हुये लोगों में एक तो इतनी इंटैलीजैंसी नहीं बची, ह्यूमन ब्रेन पहले के मुकाबले आज डवलप नहीं है, मेरी सोच के मुताबिक... पहले तीन सौ साल पहले, तीन हजार साल पहले मिस्र में जो सर्वेरियां हुई हैं, जो ममीज़ मिली हैं, जो उनपे ऑपरेशन हुये मिले हैं, जो डैड बॉडीज़ मिली हैं, अभी तक हम वहां तक पहुंच भी नहीं पाए हैं... ऐसे, एक बुक मैंने पढ़ी थी उसमें, मिस्र में ऐसे दीये जलते हुये मिले हैं जो पुराने, तेंतीस सौ साल, चौंतीस सौ साल से लगातार जल रहे हैं और जो उसमें मैटीरियल पड़ा है, वो जस्ट 25% या 40%, 50% यूज़ हुआ है... यानि वो अभी इतने ही साल तक और जल सकते हैं... मिस्र में ऐसे दीये मिले हैं... तो उस वक्त का साईंस, जब मशीनरी नहीं थी, कितना डवलप रहा होगा... तो उन लोगों को हम पूरी तरह से इग्नोर तो नहीं कर सकते जो यूनानी सिस्टम को चला रहे हैं, गांव-देहातों में जो इस सिस्टम को आज चला रहे हैं... हां, लेकिन, आज की डेट में उसे क्वालीफाईड टच देना इसलिये जरूरी है के जो चीज हमारी रेयर होती चली गई हैं, बहुत, सारा सिस्टम, बहुत सारी दवाईयां खो चुकी हैं... बहुत सारा आज हम खो चुके हैं... क्योंकि मान लिया किसी के वालिद मोहतरम को ईलाज आता था, उन्होंने, आज भी ये परंपरा गांव-देहात में बड़ी चलती है... वो फार्मूले नहीं बताते अपने और ना ही इन्हें कलमबंद करते हैं, लिखते भी नहीं हैं... मेरे मामू हकीम अब्दुल वाहिद शल्फी, हकीम हुये हैं, बड़े पॉपुलर हुये हैं, 94 साल की ऐज में उनका 1994 में देहान्त हो गया है और वो नजीबाबाद, यू.पी. में हिकमत की प्रैक्टिस किया करते थे... क्वालीफाईड हकीम थे, उन्होंने देहरादून से 1918 में बी.यू.एम.एस. किया था...लेकिन वो क्वाईट इंटीलीजैंट आदमी थे... उनके यहां कैंसर का जो ईलाज, मेरी, जब मैं स्टूडैंट यूनानी था, मैंने देखा है कि उनके यहां कैंसर के इतने मरीज आते थे और इतने ठीक हुआ करते थे, आज उनकी बताई हुई कुछ, चंद दवाईयां, जो मैं उनके साथ, जो जंगल में वो कलैक्ट किया करते थे ना, अपने आप बनाते थे वो सारी दवाई, सैल्फ फॉरमेशन थी उनकी, उन्होंने कोई गोली बाजार से नहीं खरीदी थी, किसी को कोई चटनी मंगा के नहीं दी... वो सैल्फ फॉरमेशन किया करते थे... हमारे भी अब पढ़ाया जाता है, सैदला एक डिपार्टमेंट है, जिसमें हमें मैडीसन की फॉरमेशन सिखाई जाती है... मैं भी कोशिश करता हूं के कुछ दवाईयां, पेशैंट अगर चाहता है, तो हम लोग अपनेआप बनवा के देते हैं उन्हें... वो कॉस्टली तो पडती हैं मार्किट से, एक कमर्शियल पर्पस से बनाई हुई और एक जस्ट ट्रीटमेंट परपस से बनाई हुई... फिर कई बार ऐसा होता है, बूटी लेने के लिये हमें देहरादून की पहाड़ियों तक जाना पड़ता है... नजीबाबाद मेरा बेसिक रहा है तो नजीबाबाद से हमें काफी-कुछ बूटियां मिल जाती हैं... खेत हैं हमारे, उनसे मिल जाती हैं... तो हमारे मामू वो ईलाज किया करते थे... और कैंसर के बहुत सारे मरीज मैंने अपनेआप ठीक होते देखे हैं... ऐसी कई मिसालें हैं, लेकिन हम मैं उनसे पूछता था, मामू आज ईलाज क्या देते हो, मुझे बता दो, तो वो कहते थे, अरे अभी मैं कौन सा मरा जा रहा हूं... दे जाऊंगा, मैं तुझे बता के जाऊंगा... और इत्तफाक से मैं दिल्ली में था, उन्हें हार्ट अटैक आया, वो चले गये...ना तो उन्होंने अपने फार्मूले कलमबंद किये, ना उस सेदला को, जो मैडीसन वो बनाया करते थे, उसे पेपर फार्म में लाये, ना वो उसे, किसी भी तरह से, कुछ भी नहीं छोड़ के गये यूनानी सिस्टम का... और जहां तक मैं समझता हूं ये देश को एक बहुत बड़ा लौस है, उनकी जो नॉलेज थी, जिसे आज ये इंडिया यूज़ नहीं कर रहा है या यूनानी सिस्टम को यूज़ करने वाले हम लोग उसे यूज़ नहीं कर रहे हैं... ये हमारे लिये लौस है... ऐसी खानदानी जो तमाम दवाईयां जो रेयर होती चली गई हैं... पहले फोड़े-फुन्सियों पे मरहम बनाया करते थे लोग, आज भी थाने के पास वो दो-तीन जगह बैठे हैं, बनाते हैं, लेकिन मरहम की, बेसिकली, मैं खुद यूनानी फिज़िशियन हूं, मुझे मरहम बनाना नहीं आता... क्यों? क्योंकि मैं फोड़े-फुन्सी का ईलाज नहीं करता... जबकि ये खानदानी पेशा वाले बड़ा अच्छा मरहम बनाते हैं... लेप बनाते हैं, दर्दों के लेप बनाते हैं... मेरे को जितनी, किताबी जानकारी मुझे अच्छी है, लेकिन किताब के अलावा हटके भी कुछ है... जो आज की डेट में सिर्फ रेयर ही बनाया हुआ है... और पूरी कम्पलीट यूनानी के लिये हमें उन सब चीजों तक भी जाना ही होगा... मेरी अपनी सोच है ये... हमें उनसे भी कुछ चाहिये, उनमें जागरूकता ऐसी पैदा करनी चाहिये कि जो फार्मूले उन लोगों के पास हैं, उन्हें साईंटीफिकली प्रूव करें, थोड़ा सा उनपे रिसर्च करें, उन्हें देखें, क्योंकि मरीज उनसे ज्यादा अच्छे ठीक होते हैं... आप यहीं चले जाईये घोड़े वाली गली में... कट, कट, कट, कट... डॉक्टर साहब आप वहीं से, थोड़ा सा... जहां खत्म किया था आपने... तो सिफा सा आ गया, तो लाईट चली गई थी... तो हमारे मामू ने वो चीजें हम लोगों तक नहीं प्रोवाईड कराई... नतीजा ये हुआ कि जो एक बहुत ब्रॉड जो उनकी रिसर्च, 1918 में उन्होंने बी.यू.एम.एस. में एड्मिशन लिया था, 23-24 में पास हुये थे... सन् 1 की पैदाईश थी उनकी, 1901 की, और 1994 में 94 की एज़ में उनकी डैत्थ हुई... तो इस लंबे पीरियड की, 74-73 साल की प्रैक्टिस में जो उन्होंने रिसर्च की थी, जो जानकारियां हासिल की थी, काश वो कलमबन्द कर गये होते, वो तो एक क्वालीफाईड हकीम थे, ना तो वो किसी को बता के गये, औलाद उनके कोई थी नहीं, तो ये इतनी बड़ी चीज यहीं की यहीं खत्म हो गई... मैं, जबकि एक यूनानी फिजिशियन हूं, मैं भी उनसे बहुत-कुछ गेन नहीं कर पाया... इसी तरह हमारी सिस्टम जो है, जो, आज भी बहुत से गांवों में ऐसे लोग पड़े हैं जिनके खानदान में कभी हकीम हुये हैं और वो हिकमत चला रहे हैं... लेकिन आप उनसे पूछने जाओ के आप फार्मूला क्या यूज करते हो, ना तो वो कलमबन्द करते हैं, ना वो बताते हैं, नतीजा ये होता है कि डे बाए डे, डे बाए डे, ये रेयर ट्रीटमेंट, एक बहुत अच्छी चीजें हैं, वो खत्म होती चली जा रही हैं, दुनिया से... अभी आप यहीं गली घोड़े वाली में जाईये, एक हकीम बैठते हैं, वो हडि्डयों का ईलाज करते हैं, पहलवान हकीम के नाम से... तुर्कमान गेट के पास जो हैं? हां जी, हां जी, यस... तो आप उनके पास जाईये... मैंने वहां एम.एस. ऑरथोपैडिक्स सर्जरी के लोगों को ट्रीटमेंट कराते देखा है अपना... एक एम.एस. का एक्सीडेंट हुआ, ऑरथोपैडिक्स सर्जरी में एम.एस., उनका हाथ यहां से फ्रैक्चर हो गया, फ्रैक्चर होने के बाद उन्होंने ऑपरेट कराया और वो ऑपरेशन भी गलत हो गया... हाथ यूं हो गया उनका... तो मेरे पास आये वो... बोले यार, डॉक्टर मुकीम, परेशान हूं, राईट हैंड है, और ये ही मेरी ज़िंदगी की रोज़ी-रोटी थी... ये खराब हो गया... मैंने कहा डॉक्टर साहब, आप तो सर्जन हैं, दुबारा ऑपरेट करा दो... गंगाराम जा के करा दो, कहीं बढ़िया... उन्होंने कहा, यार एक उसका नाम सुना है, आप मुझे वहां ले चल... मैंने कही, आपको यकीन है, कि यकीन नहीं होता तो मैं आता नहीं... मेरा एक पेशैंट ऐसे ही कभी गया था, वो ठीक हुआ है... मैं उन्हें ले के चला गया वहां... उन्होंने कहा, देखा हाथ, पूछा कि भई तुम कौन हो, तो बोले कि भई मैं डॉक्टर हूं, और हडि्डयों का डॉक्टर हूं... पहले तो वो हंसे... बोले के मूसल, एक इतना बड़ा मुदगल उठा के बोले, इसे झेल लेगा... वो हंसने लगे... के क्या मतलब? के इसे झेल ले तो बता मैं तेरा ईलाज करूंगा... और मरता क्या नहीं करता, उन्होंने कहा, के यार बरबाद तो है ही, ज्यादा खराब होगा तो दोबारा ऑपरेशन पे चला जाऊंगा... मुझसे कहा उन्होंने, के खराब होगा तो दोबारा ऑपरेशन पे चला जाऊंगा... और ठीक हो गया तो देखते हैं भई इन्हें... उन्होंने कहा कि हां जी, मैं तैयार होकर आया हूं, झेल लूंगा... मैंने कहा अच्छा... थोड़ी देर बातें की, उन्होंने चाय पिलवाई, चाय पिलवाने के बाद दो मुस्टंडे पहलवान बुलवाये और बोले, अरे पकडिये इस डॉक्टर का हाथ... (हंसते हुये) इसी लैंग्वेज में... और उन्होंने हाथ पकड़ा और नीचे फ़र्श पर रख दिया... और वो अपना, जैसे, क्या बोलते हैं, बेलन होता है ना खाना बनाने का, इतना मोटा है वो उनके पास... यूं लिया, और यूं हाथ को सीधे रोल कर दिया... डॉक्टर साहब तो चींख मार पड़े... कि हाय मरा... और दोनों ने छोड़ा नहीं... उसे उन्होंने बाई फोर्स उनकी सारी हडि्डयां तोड़ के सीधी कर दी... तोड़ दी हडि्डयां, फ्रैक्चर कर दिया हाथ उनका... डॉक्टर कहने लगे, मैं मर गया... मैं गलत जगह आ गया... मैंने कहा, अरे झेल लेगा... फिर उन्होंने उसपे कोई देसी लेप लगाया, जिसके बारे में वो भी नहीं बताते किसी को, देसी लेप लगाया, यहां पे बांस की लकडियां ली, थोड़े-थोड़े टुकड़े... उन्होंने यहां उन्हें लगाया... और इस तरह से हाथ को ऐसा फिक्स कर दिया, के पूरी तरह से, प्लास्टर की तरह से उन्होंने उसे पट्टी बांध के फिक्स कर दिया, लेप लगा के... और बोले के अब तू तीन हफ्ते बाद आ मेरे पास, तब देखूंगा...मैं डॉक्टर साहब को तीन हफ़्ते बाद लेकर गया, जब हाथ खोला उनका, वैरी स्ट्रेंज, उनका हाथ पूरा सीधा था, जो यूं हो चुका था... जो यूं हो चुका था एक्सीडेंट में, पूरा सीधा था एकदम... उन्होंने एक बार और उसी तरह से पट्टी की और यूं बोले, अब तू तीन महीने में आना... बोले दवाई क्या खाऊं... उन्होंने कहा, कुछ मत खा, एक गिलास दूध सुबह पी, एक गिलास दूध शाम को पी, मलाई हटा दे, तुझे मोटा होने का डर है तो... कैल्शियम उससे मिल जायेगा, बाकी कुछ मत खा... हां, पान खा ले, खाना है तो, चूना लगा के... वो कैल्शियम को बॉडी में डलवाना चाहते थे... दूध की और उसकी शक्ल में वो चली गई... और नाओ ही इज़ ए वैरी गुड सर्जन, इन ऑरथोपैडिक्स सर्जरी... आज वो दिल्ली में ही हैं, मैं नाम उनकी इजाज़त के बगैर अभी बताना नहीं चाहूंगा कैमरे के सामने, अदरवाईज़, कहीं ऐसा, अगर उन्होंने इजाज़त दी, एक बार पूछके, तो दोबारा कभी आपसे गुफ्तगू करने का मौका मिला, तो मैं उन्हें इस कैमरे के सामने फिर से पेश कर दूंगा, अगर उन्होंने इजाज़त दी, क्योंकि ये उनकी प्रैक्टिस को भी इफैक्ट करता है... वो ऑरथोपैडिक सर्जन हैं बेसिकली...

translation (hindi): 

 

exercise (hindi): 

आज के मुकाबले में पहले की पद्धतियाँ क्यों ज़्यादा विकसित थी?

1 मिस्र में सर्जरी होती थीं

2 कैंसर भी कई बार ठीक हो जाता है

3 सब

4 पहले ज़्यादा इंटैलीजैंट लोग थे, खुद ही दवा बनाते थे

आजकल जड़ी बूटियाँ कहाँ से मिलती हैं?

1 देहरादून की पहाड़ियों से

2 नज़ीबाबाद

3 सब

4 नज़ीबाबाद के खेतों से

आजकल कौन सी ऐसी्दवाएँ हैं जो रेयर होती जारही हैं?

1 फोड़े फुन्सी का मरहम

2 दर्दों का लेप

3 सब

4 कुछ दवाएँ जो खुद बनाते थे

vocabulary (urdu): 

Belief, faith

یقین

Treatment

علاج

Hereditary treatment

خاندانی علاج

Guru-disciple tradition

گرو ششیہ پرمپرا

Became bounded

دائرے میں بندھ گئے

Disease, illness

بیماری

Pulse

نبض

Use

استعمال

 

نبّاض

In a country village

گاؤں دیہاتوں میں

Medicines

دوائیاں

Written

قلمبند

Resourcefulness

حکمت

Few medicines

چند دوائیاں

Jungle, forest

جنگل

Were making themselves

اپنے آپ بناتے تھے

Pill

گولی

 

صیدلہ

Herb

بوٹی

Precedents

مثال

Hereditary

خاندانی

On pimples and boils

پھوڑے پھنسیوں پہ

Ointment, balm, salve

مرحم

Awareness, vigilance

جاگرکتا

Bone treatment

ہڈّیوں کا علاج

Hand

ہاتھ

Distraught, vexed, troubled, worried

پریشان

Life

زندگی

Livelihood

روزی روٹی

Became bad

خراب ہو گیا

Faith, belief

یقین

Orthopedist, bone specialist

ہڈّیوں کا ڈاکٹر

What does not die

مرتا کیا نہیں مرتا

Broken down, finished

برباد

Will bear

جھیل لونگا

Well-built people

مسٹنڈے پہلوان

Rolling pin

بیلن

Screamed

چیخ مار پڑے

Oh! I'm dead!

ہائے مرا

Bones

ہڈّیاں

Country herbal paste

دیسی لیپ

Bandage

پٹّی

Herbal paste

لیپ

Medicine, drug

دوائی

A glass of milk

ایک گلاس دودھ

Milk

دودھ

Cream

ملائی

Fat

موٹا

Betel leaves

پان

Lime, mortar

چونا

transcription (urdu): 

ویسے یہ تو ایک یقین کی بات ہے لوگوں کے۔۔۔ جہاں تک سائنٹفکل ٹریٹمینٹ کی بات ہے، تو سائنٹفکلی اگر کسی کو علاج دیا جا رہا ہے، تو جہاں تک میری اپنی سوچ ہے، وہ بیٹر ٹریٹمینٹ ہے۔۔۔ میں یہ نہیں کہ رہا کہ جو خاندانی علاج چلا آ رہا ہے، یا جو گرو ششیہ پرمپرا کے ذریعے علاج چلا جا رہا ہے، آ رہا ہے، وہ کم ہے۔۔۔ بیسکلی یونانی تو آئے ہی گرو ششیہ پرمپرا کے تھرو دنیا میں ہے۔۔۔ اور یہاں تک دیکھا گیا ہے کہ وہ لوگ زیادہ پرفیکٹ رہے ہیں علاج کے معماملوں میں، آج کی تھیوری سے۔۔۔ ہم لوگ تو ایک دائرے میں بندھ گئے کہ، ایک لمٹیشنس ہیں ہماری، کہ ہم نے یہ پڑھنا ہے، یہ ڈائگنوسس کا پروسیجر ہے، اسی سسٹم پہ چلوگے تو یہ بیماری ہے، اس سسٹم پہ چلوگے وہ بیماری ہے۔۔۔ آج ہم، بیسکلی ہم بھی ویسے بھی ہم تو نبض دیکھ کے ہی علاج کرتے ہیں، یہ سٹیتھو رکھا ضرور ہے اور یہ بلڈ پریشر بھی، ہم صرف آج کی ڈیٹ کی ماڈرن ٹریٹمینٹ کا سہارا لینے کے لئے اسے استعمال کرتے ہیں، نبض دیکھ کے ہی علاج دیتے ہیں ہم۔۔۔ لیکن ہم سے کئی سو گناہ زیادہ نبّاض تھے وہ لوگ، جو پہلے خاندانی علاج لیا کرتے تھے۔۔۔ لیکن آج کی ڈیٹ میں بیٹھے ہوئے لوگوں میں ایک تو اتنی انٹیلجینسی نہیں بچی، ہیومن برین پہلے کے مقابلے آج ڈویلپ نہیں ہے، میری سوچ کے مطابق۔۔۔ پہلے تین سو سال پہلے، تین ہزار سال پہلے مصر میں جو سروریاں ہوئی ہیں، جو ممیز ملی ہیں، جو ان پہ آپریشن ہوئے ملے ہیں، جو ڈیڈ باڈیز ملی ہیں، ابھی تک ہم وہاں تک پہنچ بھی نہین پائے ہیں۔۔۔ ایسے، ایک بک میں نے پڑھی تھی اس میں، مصر میں ایسے دیے جلتے ہوئے ملے ہیں جو پرانے، تینتیس سو سال، چونتیس سو سال سے لگاتار جل رہے ہیں اور جو اس میں مٹریریل پڑا ہے، وہ جسٹ ٹوینٹی فائو پرسینٹ یا فورٹی پرسینٹ، ففٹی پرسینٹ یوز ہوا ہے، یعنی وہ ابھی اتنے ہی سال تک اور جل سکتے ہیں۔۔۔ مصر میں ایسے دیے ملے ہیں۔۔۔ تو اس وقت کا سائنس، جب مشینری نہیں تھی، کتنا ڈویلپ رہا ہوگا۔۔۔ تو ان لوگوں کوہم پوری طرح سے اگنور تو نہیں کر سکتے جو یونانی سسٹم کو چلا رہے ہیں، گاؤں دیہاتوں میں جو اس سسٹم کو آج چلا رہے ہیں۔۔۔ لیکن،ہاں، آج کی ڈیٹ میں اسے کوالفائڈ ٹچ دینا اس لئے ضروری ہے کہ جو چیز ہماری ریر ہوتی چلی گئی ہیں، بہت، سارا سسٹم، بہت ساری دوائیاں کھو چکے ہیں۔۔۔ بہت سارے علاج ہم کھو چکے ہیں۔۔۔ کیونکہ مان لیا کسی کے والد محترم کو علاج آتا تھا، انہوں نے، آج بھی یہ پرمپرا گاؤں دیہات میں بڑی چلتی ہے۔۔۔ وہ فارمولے نہیں بناتے اپنے اور نہ ہی انہیں قلمبند کرتے ہیں، لکھتے بھی نہیں ہیں۔۔۔ میرے مامو حکیم عبد الواحد شلفی، حکیم ہوئے ہیں، بڑے پاپیولر ہوئے ہیں، 94 سال کی ایج میں ان کا 1994 میں دیہانت ہو گیا ہے اور وہ نجیباباد، یو۔ پی۔ میں حکمت کی پریکٹس کیا کرتے تھے۔۔۔ کوالفائڈ حکیم تھے۔۔۔ انہوں نے دیہرادون سے 1918 میں بی۔یو۔ایم۔ایس کیا تھا۔ لیکن وہ کوئک، انٹیلجینٹ آدمی تھے۔ ان کے یہاں کینسر کا جو علاج، میری، جب میں سٹوڈنٹ یونانی تھا، میں نے دیکھا ہے کہ ان کے یہاں کینسر کے اتنے مریض آتے تھے اور اتنے ٹھیک ہوا کرتے تھے، آج ان کی بتائی ہوئی کچھ، چند دوائیاں، جو میں ان کے ساتھ، جنگل میں وہ کلیکٹ کیا کرتے تھے نا، اپنے آپ بناتے تھے وہ ساری دوائی، سیلف فارمیشن تھی ان کی، انہوں نے کوئی گولی بازار میں نیہں خریدی تھی، کسی کو کوئی چٹنی منگا کے نہیں دی۔۔۔ وہ سیلف فارمیشن کیا کرتے تھے۔۔۔ ہمارے بھی اب پڑھایا جاتا ہے، صیدلہ ایک ڈپارٹمینٹ ہے، جس میں ہمیں میڈسن کی فارمیشن سکھائی جاتی ہے۔۔۔ میں بھی کوشش کرتا ہوں کہ کچھ دوائیاں، پیشنٹ اگر چاہتا ہے، تو ہم لوگ اپنے آپ بنوا کے دیتے ہیں انہیں۔۔۔ وہ کاسٹلی تو پڑتی ہیں مارکٹ سے، کیونکہ ایک کمرشل پرپس سے بنائی ہوئی اور ایک جسٹ ٹریٹمینٹ پرپس سے بنائی ہوئی۔۔۔ پھر کئی بار ایسا ہوتا ہے، بوٹی لینے کے لئے ہمیں دہرادون کی پہاڑیوں تک جانا پڑتا ہے۔۔۔ نجیب آبات میرا بیسک رہا ہے تو نجیب آبات سے ہمیں کافی کچھ بوٹیاں مل جاتی ہیں۔۔۔ کھیت ہیں ہمارے، ان سے مل جاتی ہیں۔۔۔ تو ہمارے ماموں وہ علاج کیا کرتے تھے۔۔۔ اور کینسر کے بہت سارے مریض میں نے اپنے آپ ٹھیک ہوتے دیکھے ہیں۔۔۔ ایسی کئی مسالیں ہیں، لیکن جب میں ان سے پوچھتا تھا، مامو آپ علاج کیا دیتے ہو، مجھے بتا دو، تو وہ کہتے تھے، ارے ابھی کونسا میں مرا جا رہا ہوں۔۔۔ دے جاؤنگا۔۔۔ میں تجھے بتا کے جاؤنگا۔۔۔ اور اتّفاق سے میں دلّی میں تھا، انہیں ہارٹ اٹیک آیا، وہ چلے گئے۔۔۔ نہ تو انہوں نے اپنے فارمولے قلمبند کئے، نہ اس صیدلہ کو، جو میڈسن وہ بنایا کرتے تھے، اسے پیپر فارم میں لائے، نہ وہ اسے، کسی بھی طرح سے، کچھ بھی نہیں چھوڑ کے گئے یونانی سسٹم کا۔۔۔ اور جہاں تک میں سمجھتا ہوں یہ دیش کو ایک بہت بڑا لاس ہے، ان کی جو نالج تھی، جسے آج یہ انڈیا یوز نہیں کر رہا ہے یا یونانی سسٹم کو یوز کرنے والے ہم لوگ اسے یوز نہیں کر رہے ہیں۔۔۔ یہ ہمارے لئے لاس ہے۔۔۔ ایسی خاندانی جو تمام دوائیاں جو ریر ہوتی چلی گئی ہیں۔۔۔ پہلے پھوڑے پھنسیوں کا مرہم بنایا کرتے تھے لوگ، آج بھی تھانے کے پاس وہ دو تین جگہ بیٹھے ہیں، بناتے ہیں، لیکن مرہم کی، بیسکلی، میں خود یونانی فزشن ہوں، مجھے مرہم بنانا نیہں آتا۔۔۔ کیوں؟ کیونکہ میں پھوڑے پھنسی کا علاج نہیں کرتا۔۔۔ جب کہ یہ خاندانی پیشہ والے بڑا اچّھا مرہم بناتے ہیں۔۔۔ لیپ بناتے ہیں، دردوں کے لیپ بناتے ہیں۔۔۔ میرے کو جتنی، کتابی جانکاری ہے مجھے بہت اچّھی ہے، لیکن کتاب کے علاوہ ہٹ کے بھی کچھ ہے۔۔۔ جو آج کی ڈیٹ میں صرف ریر ہی بنایا ہوا ہے۔۔۔ اور پوری کمپلیٹ یونانی کے لئے ہمیں ان سب چیزوں تک بھی جانا ہی ہوگا۔۔ میری اپنی سوچ ہے یہ۔۔۔ ہمیں ان سے بھی کچھ چاہئیے، ان میں جاگروکتا ایسی پیدا کرنی چاہئیے کہ جو فارمولے ان لوگوں کے پاس ہیں، انہیں سائنٹفکلی پروو کریں، تھوڑا سا ان پہ ریسرچ کریں، انہیں دیکھیں، کیونکہ مریض ان سے زیادہ اچّھے ٹھیک ہوتے ہیں۔۔۔ آپ یہیں چلے جائیے گھوڑے والی گلی میں۔۔۔

 

کٹ، کٹ، کٹ، کٹ۔۔۔ ڈاکٹر صاحب آپ وہیں سے، تھوڑا سا۔۔۔ جہاں ختم کیا تھا آپ نے۔۔۔ صفہ سا آ گیا، تو لائٹ چلی گئی تھی۔۔۔

 

تو ہمارے مامو نے وہ چیزیں ہم لوگوں تک نہیں پرووائڈ کرائی۔۔۔ نتیجہ یہ ہوا کہ جو ایک بہت بروڈ جو ان کی ریسرچ، 1918 میں انہوں نے بی۔ یو۔ ایم۔ ایس۔ میں ایڈمشن لیا تھا، 24-23 میں پاس ہوئے تھے۔۔۔ سن 1 کی پیدائش تھی ان کی، 1901 کی، اور 1994 میں 94 کی ایج میں ان کی ڈیتھ ہوئی۔۔۔ تو اس لمبے پیرئیڈ کی، 74-73 سال کی پریکٹس میں جو انہوں نے ریسرچ کی تھی، جو جانکاریاں حاصل کی تھیں، کاش وہ قلمبند کر گئے ہوتے، وہ تو ایک کوالفائڈ حکیم تھے، نا تو وہ کسی کو بتا کے گئے، اولاد ان کے کوئی تھی نہیں، تو یہ اتنی بڑی چیز یہیں کی یہیں ختم ہو گئی۔۔۔ میں، جب کہ ایک یونانی فزشن ہوں، میں بھی ان سے بہت کچھ گین نہیں کر پایا۔۔۔ اسی طرح ہماری سسٹم جو ہے، جو، آج بھی بہت سے گاؤں میں ایسے لوگ پڑے ہیں جن کے خاندان میں کبھی حکیم ہوئے ہیں اور وہ حکمت چلا رہے ہیں۔۔۔ لیکن آپ ان سے پوچھنے جاؤ کہ آپ فارملہ کیا یوز کرتے ہو، نہ تو وہ قلمبند کرتے ہیں، نہ وہ بتاتے ہیں، نتیجہ یہ ہوتا ہے کہ ڈے بائی ڈے، ڈے بائی ڈے، یہ ریر ٹریٹمینٹ کا جو ایک بہت اچّھی چیزیں ہیں، وہ ختم ہوتی چلی جا رہی ہیں، دنیا سے۔۔۔ ابھی آپ یہیں گلی گھوڑے والی میں جائیے، ایک حکیم بیٹھتے ہیں، وہ ہڈّیوں کا علاج کرتے ہیں، پہلوان حکیم کے نام سے۔۔۔

 

ترکمان گیٹ کے پاس جو ہیں؟

 

ہاں جی، ہاں جی، یہ۔۔۔ تو آپ ان کے پاس جائیے۔۔۔ میں نے وہاں ایم۔ ایس۔ اورتھوپیڈکس سرجری کے لوگوں کو ٹریٹمینٹ کراتے دیکھا ہے اپنا۔۔۔ ایک ایم۔ ایس۔ کا ایکسیڈینٹ ہوا، اورتھوپیڈکس سرجری میں ایم۔ ایس، ان کا ہاتھ یہاں سے فریکچر ہو گیا، فریکچر ہونے کو بعد انہوں نے آپریشن کرایا اور وہ آپریشن بھی غلت ہو گیا۔۔۔ ہاتھ یوں ہو گیا ان کا۔۔۔ تو۔۔۔ تو میرے پاس آئے وہ۔۔۔ بولے یار، ڈاکٹر مقیم، پریشان ہوں، رائٹ ہینڈ ہے، اور یہ ہی میری زندگی کی روزی روٹی تھی۔۔۔ یہ خراب ہو گیا۔۔۔ میں نے کہا  ڈاکٹر صاحب، آپ تو سرجن ہیں، دوبارہ آپریشن کرا دو۔۔۔ گنگارام جا کے کرا دو، کہیں بڑیا۔۔۔ انہوں نے کہا، یار ایک اس کا نام سنا ہے، آپ مجھے ہواں لے چلیں۔۔۔ میں نے کہا، آپ کو یقین ہے، کہ یقین نہیں ہوتا تو میں آتا نہیں۔۔۔ میرا ایک پیشنٹ ایسے ہی کبھی گیا تھا، وہ ٹھیک ہوا ہے۔۔۔ میں انہیں لے کے چلا گیا وہاں۔۔۔ انہوں نے کہا، دیکھا ہاتھ، بولے کہ بھئی تم کون ہو، تو بولے کہ بھئی میں ڈاکٹر ہوں، اور ہڈّیوں کا ڈاکٹر ہوں۔۔۔ پہلے تو وہ ہنسے۔۔۔ بولے کہ موسل، ایک اتنا بڑا مسگل اٹھا کے بولے، اسے جھیل لیگا؟۔۔۔ عہ ہنسنے لگے، کہ کیا مطلب؟ کہ اسے جھیل لے تو بتا میں تیرا علاج کرونگا۔۔۔ اور مرتا کیا نہیں کرتا، انہوں نے کہا، کہ یار برباد تو ہے ہی، زیادہ خراب ہوگا تو دوبارہ آپریشن پہ چلا جاؤنگا۔۔۔ مجھے کہا انہوں نے، کہ خراب ہوگا تو دوبارہ آپریشن پہ چلا جاؤنگا۔۔۔ اور ٹھیک ہو گیا تو دیکھتے ہیں بھئی انہیں۔۔۔ انہوں نے کہا کہ ہاں جی، میں تیّار ہو کر آیا ہوں، جھیل لونگا۔۔۔ میں نے کہا اچّھا۔۔۔ تھوڑی دیر باتیں کی، انہوں نے چائے پلوائی، چائے پلوانے کے بعد دو مسٹنڈے پہلوان بلوائے اور بولے، ارے پکڑئیے اس ڈاکٹر کا ہاتھ۔۔۔ (ہنستے ہوئے) اسی لینگویج میں۔۔۔ اور انہوں نے ہاتھ پکڑا اور نیچے فرش پر رکھ دیا۔۔۔ اور وہ اپنا، جیسے، کیا بولتے ہیں، بیلن ہوتا ہے نا کھانا بنانے کا، اتنا موٹا وہ ہے ان کے پاس۔۔۔ یوں لیا، اور یوں ہاتھ کو سیدھے رول کر دیا۔۔۔ ڈاکٹر صاحب تو چیخ مار پڑے۔۔۔ کہ ہائے مرا۔۔۔ اور دونوں نے چھوڑا نہیں۔۔۔ اسے انہوں نے بائی فورس ان کی ساری ہڈّیاں توڑ کے سیدھی کر دیں۔۔۔ توڑ دیں ہڈّیاں، فریکچر کر دیا ہاتھ ان کا۔۔۔ ڈاکٹر کہنے لگے، میں مر گیا۔۔۔ میں غلت جگہ آ گیا۔۔۔ میں نے کہاِ، ارے جھیل لے۔۔۔ پھر انہوں نے اس پہ کوئی دیسی لیپ لگایا، جس کے بارے میں وہ بھی نہیں بتاتے کسی کو، دیسی لیپ لگایا، یہاں پہ بانس کی لکڑیاں لیں، تھوڑے تھوڑے ٹکڑے۔۔۔ انہوں نے یہاں انہیں لگایا۔۔۔ اور اس طرح سے ہاتھ کو ایسا فکس کر دیا، کے پوری طرح سے، پلاسٹر کی طرح سے انہوں نے اسے پٹّی باندھ کے فکس کر دیا، لیپ لگا کے۔۔۔ اور بولے کہ اب تو تین ہفتے بعد آ میرے پاس، تب دیکھونگا۔۔۔ میں ڈاکٹر صاحب کو تین ہفتے بعد لے کر گیا، جب ہاتھ کھولا ان کا، ویری اسٹرینگ، ان کا ہاتھ پورا سیدھا تھا، جو یوں ہو چکا تھا۔۔۔ جو یوں ہو چکا تھا ایکسڈینٹ میں، پورا سیدھا تھا ایک دم۔۔۔ انہوں نے ایک بار اور اسی طرح سے پٹّی کی اور یوں بولے، اب تو تین مہینے میں آنا۔۔۔ بولے دوائی کیا کھاؤں۔۔۔ انہوں نے کہا، کچھ مت کھا، ایک گلاس دودھ صبح پی، ایک گلاس دودھ شام کو پی، ملائی ہٹا دے، تجھے موٹا ہونے کا ڈار ہے تو۔۔۔ کیلشیم اس سے مل جائیگا، باقی کچھ مت کھا۔۔۔ ہاں، پان کھا لے، کھانا ہے تو، چونا لگا کے۔۔۔ وہ کیلشیم کو باڈی میں ڈلوانا چاہتے تھے۔۔۔ دودھ کی اور اس کی شکل میں وہ چلی گئی۔۔۔ اور ناؤ ہی از اے ویری گڈ سرجن، ان اورتھوپیڈکس سرجری۔۔۔ آج وہ دلّی میں ہی ہیں، میں نام ان کی اجازت کے بغیر ابھی بتانا نہیں چاہونگا کیمرے کے سامنے، ادروائز، کہیں ایسا، اگر انہوں نے اجازت دی، ایک بار پوچھ کے، تو دوبارہ کبھی آپ سے گفتگو کرنے کا موقع ملا، تو میں انہیں اس کیمرے کے سامنے پھر سے پیش کر دونگا، اگر انہوں نے اجازت دی، کیونکہ یہ ان کی پریکٹس کو بھی افیکٹ کرتا ہے۔۔۔ وہ اورتھوپیڈک سرجن ہیں بیسکلی۔۔۔

 

 

exercise (urdu): 

आज के मुकाबले में पहले की पद्धतियाँ क्यों ज़्यादा विकसित थी?

1 مصر میں سرجری ہوتی تھی

2 کینسر بھی کئی بار ٹھیک ہو جاتا ہے

3 سب

4 پہلے زیادہ انٹیلگینٹ لوگ تھے، خود ہی دوا بناتے تھے

آجکل جڑی بوٹیاں کہاں سے ملتی ہیں؟

1 دیہرادون کی پہاڑیوں سے

2 نجیب آباد سے

3 سب

4 نجیب آباد کے کھیتوں سے

آج کل کونسی ایسے دوائیاں ہیں جو ریر ہوتی جارہی ہیں؟

1 پھوڑے پھنسی کا مرحم

2 دردوں کا لیپ

3 سب

4 کچھ دوائیں جو خود بناتے تھے